कोरोना और जल संकट से साथ-साथ लड़ने का वक़्त

कोरोना से खड़ा हो सकता है भीषण जल संकट

नई दिल्ली: हमारा देश कई संकटों से जुझता रहा है। जिसमें पेय जल संकट मुख्य है। देश की एक बड़ी आबादी पेज जल संकट का सामना करने को मजबूर है। वहीं अब कोरोना वायरस के कारण इस संकट का और अधिक भयावह होने का खतरा बढ़ गया है। यही कारण है कि मौजूदा परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए जल शक्ति मंत्रालय ने आम जनता से कोरोना बचाव की सावधानियों के तहत पानी के विवेकपूर्ण उपयोग करने की अपील की है। मंत्रालय का लक्ष्य यह है कि जल संकट और कोरोना से देशवासी एक साथ प्राथमिकता से जंग लड़े।

देश में पेयजल की समस्या ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक मेट्रो शहरों में है। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि स्टैंडर्ड वाटर लिमिट से अधिक पानी के इस्तेमाल के लिए दिल्ली और मुंबईकर अधिक दोषी रहा है। यह भी जाहिर है कि इन शहरों में कोविड-19 वायरस का प्रभाव अधिक है। तो बचाव व रोकथाम भी अधिक करना होगा। ऐसे में शहरों में पानी का अधिक इस्तेमाल होगा। तो अब इन्हीं शहरों को पानी की बचत पर भी विशेष ध्यान होगा।

मोदी सरकार द्वारा जल संकट से बचने के लिए अनेक योजनाओं पर तेज गति से कार्य शुरू हुआ। बहुत हद तक इनके साकारात्मक परिणाम भी दिखने लगे। जल संकट से बचाव के लिए अटल भूजल योजना, जल जीवन मिशन, जलशक्ति अभियान की मुख्य भूमिका को काफी सराहना भी मिली। लेकिन लॉकडाउन ने इन योजनाओं की गति को धीमा कर दिया। योजनाओं की समीक्षा करते हुए केंदीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने इस बात का सज्ञान लिया। उनके दिशा निर्देशन में जल जीवन मिशन और जल शक्ति अभियान का संचालन लॉकडाउन के बाद कैसे होगा, इसकी एक कार्य-नीति बनी। गजेंद्र सिंह शेखावत का मानना है कि भविष्य की परिस्थितियों के मुताबिक इन योजनाओं का क्रियान्वयन लचीले ढंग से होना ही बेहतर होगा।

‘मन की बात’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 30 जून, 2019 को अपने दूसरे कार्यकाल में पहली बार ‘मन की बात’ कार्यक्रम में जल-संरक्षण के मुद्दे पर बात की। पीएम मोदी ने कहा कि जल-संरक्षण के लिए इस्तेमाल होने वाले पारम्परिक तौर-तरीकों को साझा करने की ज़रूरत है। उनकी जल-संरक्षण अपील के अगले ही दिन केन्द्र सरकार ने जल-संरक्षण अभियान शुरू कर दिया। इसके तहत देश के 256 जिलों में अधिक प्रभावित 1592 ब्लॉकों को प्राथमिकता के आधार पर चयन हुआ। 2014 से 2018 के बीच मनरेगा बजट से इतर केवल जल-प्रबन्धन पर ही सालाना 32 हजार करोड़ रुपए खर्च कर दिए गए। मोदी सरकार ने 2017-18 में 64 हजार करोड़ रुपए के कुल खर्चे की 55 प्रतिशत राशि यानी करीब 35 हजार करोड़ रुपए जल-संरक्षण जैसे कामों पर ही खर्च किए। सरकार के इन प्रयासों के चलते ही तीन सालों में करीब 150 लाख हेक्टेयर जमीन को संजीवनी मिली।

अब वित्त वर्ष 2020—21 में सरकार ने सभी घरों तक पाइप से पानी पहुँचाने के मिशन के लिए 3 लाख 60 हजार करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। इस वित्त वर्ष में इसी योजना को 11 हजार 500 करोड़ रुपए की बजटीय सहायता मिली। जलशक्ति मंत्रालय के पेयजल व स्वच्छ विभाग के कुल बजट 21 हजार 518 करोड़ के लगभग आधा इसी योजना का है। मोदी सरकार ने विभाग के कुल बजट में 1500 करोड़ रुपए की बढ़ोतरी कर अपनी गंभीरता भी व्यक्त कर दी।

केंदीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत

जल संसाधन, नदी विकास व गंगा संरक्षण विभाग का बजट आवंटन भी 700 करोड़ रुपए बढ़ा है। विभाग को इस बार 8960 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं, जबकि बीते साल का बजट आवंटन 8245 करोड़ रुपए था। इसमें ‘नमामि गंगे’ योजना के तहत 800 करोड़ रुपए का आवंटन है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के बजट में एक हजार करोड़ रुपए की वृद्धि हुई है।

पिछले छः वर्षों के दौरान महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) भी ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण के प्रयासों को आगे बढ़ा रही है। वर्ष 2014 में मनरेगा अनुसूची-1 में संशोधन किया गया, जिसके तहत यह अनिवार्य किया गया कि कम-से-कम 60 प्रतिशत व्यय कृषि एवं उससे जुड़ी गतिविधियों पर करना होगा। परिणामस्वरूप अधिनियम के तहत स्वीकृति योग्य कार्यों की एक सूची तैयार हुई, जिसमें ऐसी लगभग 75 प्रतिशत गतिविधियों या कार्यकलापों का उल्लेख हुआ जो जल सुरक्षा एवं जल संरक्षण के प्रयासों को सीधे तौर पर बेहतर बनाते हैं।

यूएन वाटर ( यूनाइटेड नेशन वाटर) ने इस वर्ष के विश्व जल दिवस (22 मार्च) की थीम जल और जलवायु परिवर्तन रखी थी और पानी का महत्व समझाने और संभल कर इसका उपयोग करने की अपील की थी। भारत वैश्विक जल संकट से निबटने में अपनी भूमिका लगातार बढ़ा रहा है। भारतीय नागरिकों की बातचीत में जल संरक्षण अब एक निश्चित विषय है। यह पानी बचाव के लिए जागरूकता बढ़ने का संकेत भी है। केंद्र सरकार वर्तमान की वस्तुस्थिति से अवगत है। बड़ी बात यह है कि विश्व समुदाय के तकरीबन 400 करोड़ लोगों को पीने का पर्याप्त पानी नहीं मिलता, जिनमें एक चौथाई लोग भारत के हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कई बार जल संकट की चुनौतियों को अपने व्याख्यानों के माध्यम से उभारा है। हमें यह नहीं भूल सकते कि पीएम मोदी ने पानी को “पारस” से संबोधित कर उसके महत्व को अनिश्चित ऊँचाई दी थी।

भारत दुनिया में भूजल का सर्वाधिक दोहन करने वाला देश है। हमें पीने का पानी मुख्यतः भू जल स्रोतों से ही प्राप्त होता है। ऐसे में हमें ध्यान रखना होगा कि लॉकडाउन के इस समय में भी हाथ धोने व अन्य स्वच्छता कार्यों में उपयोग किए जा रहे पानी को भूजल तक पहुंचाया जा सके। गर्मी का मौसम तेज़ हो रहा है। आम जनजीवन में पानी के उपयोग को लेकर छोटी-छोटी सावधानियां और प्रयास आने वाले जल संकट की चुनौतियों का सामना करने में हमारी बड़ी सहायता करेंगे।

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