1 ही तिथि को पड़ रहे हैं भगवान शिव की आराधना के ये दो पर्व, जानें पूजन मुहूर्त

  • इस शुभ मुहूर्त में करें शिव-गौरी का पूजन
  • यहां जानें पूजन  की विधा भी
  • मिलेगा शिव जी से मनचाहा वरदान 

धर्म डेस्क: प्रत्येक मास में एकादशी की तरह दो त्रयोदशी तिथि पड़ती है जिसे प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाता है। तो वहीं स प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। मगर इस मास यानि अश्विन मास में ये दोनों ही पर्व एक ही तिथि को पड़ रही है। बता दें शास्त्रों में ये दोनों ही दिन देवों के देव महादेव को समर्पित है। जिसके उपलक्ष्य में भगवान शिव का पूजन करना अत्यंत लाभदायक माना जाता है। तो चलि जानते हैं दोनों ही व्रत का शुभ मुहूर्त-

सितम्बर 15, 2020, मंगलवार भौम प्रदोष व्रत-
06:25 पी एम से 08:46 पी एम
त्रयोदशी- 02 घण्टे 20 मिनट्स
आश्विन, कृष्ण त्रयोदशी
त्रयोदशी प्रारम्भ – 01:29 ए एम, सितम्बर 15
त्रयोदशी समाप्त – 11:00 पी एम, सितम्बर 15

मासिक शिवरात्रि पूजा समय
चतुर्दशी तिथि प्रारंभ: 15 सितंबर 2020 को रात्रि 11 बजे से
चतुर्दशी तिथि का समापन: 16 सितंबर 2020 को रात्रि 07 बजकर 56 मिनट पर होगा
पूजा का समय: 15 सितंबर रात्रि 11 बजकर 54 मिनट से 16 सितंबर को प्रात:12 बजकर 40 तक

प्रदोष व्रत का महत्व
दक्षिण भारत में प्रचलित मान्यताओं की मानें तो यहां प्रदोष व्रत को प्रदोषम के नाम से जाना जाता है, जो भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किया जाता है। बता दें प्रदोष व्रत चन्द्र मास की दोनों त्रयोदशी के दिन किया जाता है जिसमे से एक शुक्ल पक्ष के समय और दूसरा कृष्ण पक्ष के समय होता है। कुछ लोग शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के प्रदोष के बीच फर्क बताते हैं।

मासिक शिवरात्रि का महत्व
महाशिवरात्रि की तरह मासिक शिवरात्रि के व्रत का भी हिंदू धर्म में अधिक महत्व होता है। माना जाता है इस दिन व्रत रखने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। तो वहीं इस व्रत के प्रभाव से जातक को अपने क्रोध, ईर्ष्या, अभिमान और लोभ से मुक्ति मिलती है। साथ ही साथ ये व्रत मासिक जीवन में सुख और शांति प्रदान करता है तथा शिव जी के कृपा से जातक के सभी बिगड़े काम बनने लगते हैं। मान्यता है इस व्रत तो करने से संतान प्राप्ति के साथ-साथ रोगों से भी मुक्ति मिलती है।

पूजा विधि
प्रातः स्नान आदि के बाद घर के मंदिर में दीप जलाएं, तथा सर्वप्रथम भगवान गणेश की पूजा करें।
यदि घर के पूजा स्थल में शिवलिंग हो तो उसका का गंगा जल से अभिषेक करें।
अगर घर में गंगा जल न हो तो साफ़ जल से भी अभिषेक कर सकते हैं।
विधि वत भगवान शंकर के साथ देवी गौरी का पूजन करें, ध्यान रहे आखिर में इनकी आरती करना न भूलें।
अपनी इच्छा व क्षमता अनुसार भगवान शंकर को भोग लगाएं।