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इंदिरा एकादशी: पिता की मुक्ति के लिए राजा इंद्रसेन ने किया था ये व्रत

  • 13 सितंबर को है इस साल की इंदिर एकादशी
  • इस दिन होती है  भगवान श्री हरि विष्णु की पूजा
  • सबसे पहले राजा इंद्रसेन ने किया था ये व्रत
  • पिता की मुक्ति के लिए नारद मुनि से जाना था इसका महत्व

धर्म डेस्क: सनातन धर्म में एकादशी तिथि का अधिक महत्व है। साल में पढ़ने वाली प्रत्येक एकादशी को भगवान विष्णु का पूजन कर भक्त उनसे अपनी समस्त मनोकामना की पूर्ति की प्रार्थना हैं। आने वाली 13 सितंबर को इस साल की एक इंदिरा एकादशी पड़ रही है जिसकी सबसे खासियत यह है कि इस बार यह एकादशी रविवार के दिन पड़ रही है।

इस दिन लोग भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए उनके लिए व्रत रखते हैं। कहा जाता है कि इस दिन जो भी भगवान विष्णु का व्रत करता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। तथा साथ ही साथ क्योंकि यह इंदिरा एकाशी पितृपक्ष के दौरान पड़ती है, इसलिए इस दिन पितरों के नाम पर दान आदि करने का भी अधिक महत्व होता है।

मगर इंदिरा एकादशी से जुड़ी पौराणिक कथा क्या है, किसके द्वारा इस एकादशी का व्रत शुरू हुआ, इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं चलिए आप जानते हैं एकादशी से जुड़ी हुई कथा-कथाओं के अनुसार सतयुग में महिष्मति नामक एक नगर था जिसका राजा इंद्रसेन था वह बहुत ही प्रतापी था। मैं अपनी त्वचा को अपनी संतान की तरह मानता तथा उसका भरण पोषण करता हूं इंग्लिश इन की प्रजा उससे हमेशा प्रसन्न रहती थी। क्योंकि इंद्रसेन कभी अपनी प्रजा को किसी भी चीज की कमी नहीं रखता था। कथाओं के अनुसार इंद्रसेन भगवान श्री हरि विष्णु का परम भक्त था।

एक दिन अचानक नारद मुनि का राजा इंद्रसेन की सभी में आगमन हुआ। इसमें वह इंद्र सिंह के पिता का संदेश लेकर पहुंचे। उनके पिता ने उनके लिए संदेश भेजा कि पूर्व जन्म में किसी गलत कर्म के चलते वह यमलोक में ही है परंतु अब यमलोक से मुक्ति पाना चाहते हैं, जिसके लिए उनके पुत्र इंद्रसेन को इंदिरा एकादशी का व्रत करना होगा।

अपने पिता द्वारा भेजा गया यह संदेश सुनकर इंद्रसेन ने नारद मुनि से इंदिरा एकादशी व्रत के बारे में बताने को कहा जिसके बाद नारद जी ने उन्हें बताया क एकादशी अश्विन मास के कृष्ण पक्ष को पड़ती है।

जातक को एकादशी तिथि से पूर्व दशमी तिथि के दिन विधि विधान से पितरों का श्राद्ध करना चाहिए तथा अगले दिन के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। एवं भगवान पुंडरीकाक्ष का ध्यान कर उनसे पितरों वह पूर्वजों की रक्षा का वरदान प्राप्त करना चाहिए।

आगे  नारद मुनि ही बताते हैं कि इस दिन भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप की पूजा का भी अत्यंत महत्व है ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन के इस स्वरूप का पूजन करने के बाद अपने पितरों का श्राद्ध करना चाहिए। इसके अलावा रात्रि में सोने की बजाय जाकर भगवान विष्णु की वंदना तथा उनके नाम का जागरण करना चाहिए। जो लोग एकादशी के दिन व्रत करते हैं उन्हें द्वादशी के दिन किसी मंदिर में जाकर बाहर बैठे गरीबों को भोजन करवाना चाहिए।

कथाओं के अनुसार नारद जी से एकादशी का महत्व जानने के बाद राजा इंद्रसेन ने यह व्रत कर अपने पिता को मोक्ष दिलावाया था।

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