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दुनिया की सबसे लंबी रोहतांग टनल बनकर तैयार, जानिए क्या है इसकी खासियत

  •  दुनिया की सबसे लंबी रोहतांग टनल बनकर तैयार

  • सुरंग का काम पिछले  10 सालों से चल रहा था
  • सुरंग का नाम अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर रखा गया है

नेशनल डेस्क:  पूर्वी लद्दाख को पूरे देश से जोड़ने वाली सामरिक महत्व की रोहतांग टनल बनकर तैयार हो चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस टनल का उद्घाटन करने वाले हैं। हिमाचल प्रदेश के कुल्लु मनाली और लाहौल-स्पिति जिले में बनी 9 किलोमीटर लंबी इस सुरंग का काम पिछले 10 सालों से चल रहा था।

रोहतांग टनल के उद्घाटन से पहले ही इस सुरंग का नाम पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर ‘अटल टनल’ दिया गया है, क्योंकि वर्ष 2002 मे अटल बिहारी वाजपेयी ने ही इस टनल के काम का शुभारंभ किया था। लेकिन टनल का असल काम शुरू हुआ 2010 में. इस टनल के बनने से हिमाचल प्रदेश का लाहौल-स्पिति इलाका और पूरा लद्दाख अब देश के बाकी हिस्सों से 12 महीने जुड़ा रहेगा। क्योंकि रोहतांग-पास‌ (दर्रो) सर्दियों के मौसम में भारी बर्फबारी के कारण बंद हो जाता था, जिससे लाहौल-स्पिति के जरिए लद्दाख जाने वाला हाईवे छह महीने के लिए बंद हो जाता था। लेकिन अब अटल टनल बनने से इससे समस्या से निजात मिल जाएगी।

अटल टनल बनने से सेना की पूर्वी लद्दाख को जाने वाली सप्लाई लाइन भी अब 12 महीने खुली रहेगी. क्योंकि पूर्वी लद्दाख पहुंचने के लिए एक ये एक अलग एक्सेस है। दूसरा एक्सेस जो श्रीनगर के जरिए जोजिला पास से आता है वो भी भारी बर्फबारी के जरिए सर्दियों में बंद हो जाता है।

हिमाचल प्रदेश की पीर-पंजाल पर्वत श्रृंखला में करीब 9 किलोमीटर लंबी अटल-टनल इंजीनियरिंग-मार्वल है जिसे बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन यानि बीआरओ ने तैयार किया है। बीआरओ को देश की सरहद पर सड़क, ब्रिज और टनल बनाने में महारत हासिल है. लेकिन इस टनल बनाने में बीआरओ के पसीने छूट गए। क्योंकि पीर पंजाल की ये रेंज हार्ड-रॉक यानि पत्थर को काटकर इस टनल को बनाना आसान काम नहीं था। अटल टनल भारत के लिए एक रिकॉर्ड से ज्यादा सामरिक महत्व रखती है। बीआरओ को 3488 किलोमीटर लंबी भारत-चीन सीमा पर कुल 73 सामरिक महत्व की सड़क और टनल बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी। पिछले कुछ सालों में बीआरओ ने 61 सड़कें और टनल बनाकर तैयार कर ली हैं।

दरअसल, इस वक्त पूर्वी लद्दाख से सटी लाइन ऑफ एक्चुयल कंट्रोल यानि एलएसी पर भारत और चीन के बीच पिछले चार महीने से तनातनी चल रही है। लेकिन सर्दियों के मौसम में लद्दाख की कनेक्टिवेटी देश के अन्य इलाकों से कट जाता है। (पूर्वी) लद्दाख तक पहुंचने के लिए दो एक्सेस (हाईवे) हैं। पहला ‘एनएच-वन ए’ जो श्रीनगर से सोनमर्ग और जोजिला-पास (दर्रा) के जरिए करगिल होते हुए लेह पहुंचता है। अटल टनल की खासयित ये है कि इसकी सिंगल ट्यूब और डबल लेन से गाड़ियां 80 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ सकेंगी। जबकि पुराने रोहतांग-दर्रे से गाड़ियां रेंग रेंग कर चलती हैं। साथ ही कुल्लु-मनाली और लाहौल स्पिति (और लेह लद्दाख) की दूरी पूरे 46 किलोमीटर कम हो गई है, जो पहाड़ी रास्तों के हिसाब से तीन-चार घंटे बचा सकती है। मिलिट्री-परलेंस में ये काफी महत्व रखता है।

दुनिया की इस सबसे लंबी हाईवे-टनल में सेफ्टी एंड सिक्योरिटी पर खासा ध्यान दिया गया है। ये दुनिया की तीसरी और देश की पहली ऐसी सुरंग है जिसमें टनल के अंदर टनल है। इस टनल में मुख्य सुरंग के ठीक नीचे एक ‘एस्केप-टनल’ है जो ठीक उतनी ही लंबी है जितनी मुख्य टनल है। किसी भी इमरजेंसी की स्थिति में यहां से गुजरने वाले लोग इस एस्केप टनल में दाखिल हो सकते हैं और सुरक्षित बाहर आ सकते हैं।

 

 

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