- पुत्र की कुशलता के लिए रखा जाता है व्रत
- खास प्रकार के होती है भगवान शिव की पूजा
- जानिए इसका शुभ मुहूर्त व पारण समय
धर्म डेस्क: अश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी, महालक्ष्मी व्रत समापन के साथ-साथ जीवित्पुत्रिका व्रत भी किया जाने का विधान है। इसे जितिया व जिउतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है जिस तरह महिलाएं पति की कुशलता के लिए तीज आदि का व्रत रखती हैं ठीक उसी प्रकार अपने पुत्र की कुशलता आरोग्य तथा उसके सुखमय जीवन के लिए इस दिन निर्जला व्रत करती हैं। इस बार यह व्रत आज यानी 10 सितंबर गुरुवार को पड़ रहा है। मान्यताओं के अनुसार इसके उपलक्ष्य में भगवान शंकर तथा देवी पार्वती के पूजन का भी श्रेष्ठ होता है।
जीवित्पुत्रिका व्रत मुहूर्त-
अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 9 सितंबर (बुधवार) को दोपहर 1 बजकर 35 मिनट से आरंभ हो चुकी है, जो कि 10 सितंबर (गुरुवार) को दोपहर 3 बजकर 4 मिनट तक है। बता दें जीवित्पुत्रिका व्रत उदया तिथि में रखा जाता है।
पारण का समय-
जीवित्पुत्रिका व्रत रखने वाली माताएं 11 सितंबर को सूर्योदय के बाद दोपहर 12 बजे तक पारण करेंगी। इससे जुड़ी मान्यता के अनुसार जीवित्पुत्रिका व्रत का पारण दोपहर 12 बजे तक करना चाहिए।
पूजन विधि-
इस दिन प्रदोष काल में गाय के गोबर से घर के पूजा सबको दीप कर साफ करें। इसके बाद वह एक छोटा सा तालाब बनाएं। तालाब के समीप एक पापड़ की दाल लाएं और खड़ा कर उसे रख दें। फिर शालिवाहन राजा के पुत्र धर्मात्मा जीमूत वाहन की कुशनिर्मित प्रतिमा जल के पात्र में स्थापित करें। इसके बाद उन्हें दीप, धूप, अक्षत, रोली, तथा लाल और पीली से रूई से उनको सजाएं। इसके बाद में इन्हें किसी मिष्ठान का भोग लगाएं। अब मिट्टी या गोबर से मादा चीन और मादा सियार की प्रतिमा बनाकर दोनों को लाल सिंदूरअर्पित करें। आखिर में पुत्र की प्रगति और कुशलता की कामना करते हुए व्रत कथा सुने, यहां पढें।
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