- 02 सितंबर से प्रांरभ हो रहा है पितृ पक्ष
- 17 सितंबर को है सर्वपितृ अमावस्या
- इन तिथियों को करें परिजनों का श्राद्ध
धर्म डेस्क: हिंदू कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक वर्ष भाद्रपद महीने की पूर्णिमा तिथि से लेकर आश्विन माह की अमावस्या तिथि तक पितृपक्ष पड़ता है। जिस दौरान लोग अपने पितरों की शांति के लिए तर्पण आदि जैसे कर्म-कांड संपन्न करते हैं। बता दें इस बार श्राद्ध पक्ष का आरंभ भाद्रपद पूर्णिमा 2 सितंबर से हो रहा है, जिसका समापन 17 सितंबर की सर्वपितृ अमावस्या को होगा। शास्त्रों की मानें तो श्राद्ध कर्म और पितृ पक्ष एक प्रमुख तिथि और संस्कार है। इसमें कहा गया है कि जिस तरह किसी जातक के जन्म से पहले यानि गर्भधारण तथा जन्म के बाद कई संस्कार करने अनिवार्य होते हैं, ठीक मृत्यु के बाद पितर तर्पण जैसे कर्म-कांड आवश्यक होते हैं। बता दें इस पितृ पक्ष को 15 से 16 दिन समर्पित होते हैं। आमतौर पर प्रत्येक माह की अमावस्या तिथि पर भी पितरों का श्राद्ध और तर्पण किया जाता है।
परंतु पितृ पक्ष इन कार्यों के लिए सबसे फलदायक रहता है। ऐसा कहा जाता है कि इस दौरान पितर देव स्वर्गलोक से धरती पर अपने-अपने परिजनों को आशीर्वाद देने अवतरित होते हैं। मगर इस दौरान कुछ खास बातों का ध्याव रखना होता है कि किस तिथि को किसका श्राद्ध किया जाना चाहिए। लेकिन लगभग इस बारे में नहीं जानते। तो चलिए हम आपको विस्तारपूर्वक बताते हैं कि कि सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार किस तिथि को किसका श्राद्ध करना चाहिए।
किस तिथि को किसका श्राद्ध:
पितृपक्ष खासतौर पर श्राद्ध करने का समय होता है। इन 15 दिनों में श्राद्ध कर्म, पिंडदान तथा तर्पण करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है। इसकी कुछ खास तिथियां होती हैं जिसे ध्यान में रखकर ही श्राद्ध करना चाहिए।
श्राद्ध करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि परिवार की मृत्यु जिस तिथि पर हुई हो, पितृ पक्ष के दौरान उसी तिथि को मृतक व्यक्ति का श्राद्ध करें। अगर किसी को तिथि का न पता हो तो, ऐसे में सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध करना चाहिए।
परिवार की जिस महिला की मृत्यु पति के रहते हुई हो तो उस महिला का श्राद्ध नवमी तिथि में करना चाहिए।
इसके साथ ही ये भी कहा गया है कि जिस स्त्री कि मृत्यु तिथि न पता हो तो उसका श्राद्ध मातृ नवमी को ही करना लाभदायक होता है।
अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु आत्महत्या, विष और दुर्घटना आदि से हुई हो मृत व्यक्ति का श्राद्ध चतुर्दशी को किया जाना चाहिए।
इसके अलावा पिता का श्राद्ध अष्टमी तथा माता का नवमी तिथि को करना चाहिए।
जो व्यक्ति अपने पितरों का श्राद्ध नहीं करता, कहा जाता है उसकीे पूर्वजों को कभी मुक्ति नहीं मिलती तथा उनकी आत्मा भटकटी रहती है।
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